विस्तृत उत्तर
स्तोत्र के सातवें श्लोक में लास्य और तांडव नृत्य का वर्णन है:
देवी पार्वती को 'प्रपञ्चसृष्ट्युन्मुखलास्यकायै' कहा गया है — सृष्टि करने के लिए लास्य नृत्य करने वाली। लास्य नृत्य कोमल, सृजनात्मक और प्रेमपूर्ण होता है।
इसके विपरीत, शिव 'समस्तसंहारकताण्डवाय' हैं — जो प्रलयकारी, उग्र तांडव नृत्य करते हैं।
यह दर्शाता है कि सृजन और संहार, जीवन और प्रलय, दोनों एक ही परम सत्ता के अनिवार्य पहलू हैं।
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