विस्तृत उत्तर
अर्धनारीश्वर रूप की कथा शिव पुराण और नारद पुराण में वर्णित है। यह रूप शिव और शक्ति की अभिन्नता का सर्वोच्च प्रतीक है।
कथा — ब्रह्माजी ने सृष्टि रचना का कार्य संपन्न किया परंतु देखा कि जो सृष्टि उन्होंने बनाई उसमें विकास की गति नहीं है। पशु-पक्षी, मनुष्य और कीट-पतंग की संख्या में वृद्धि नहीं हो रही। ब्रह्मा चिंतित हुए और भगवान विष्णु के पास गए। विष्णुजी ने कहा — 'आप शिव जी की आराधना करें, वही उपाय बताएंगे।'
शिव का अर्धनारीश्वर प्रकटन — ब्रह्माजी ने शिव की तपस्या की। तब शिव और माता पार्वती ने मिलकर अर्धनारीश्वर रूप धारण किया — शरीर का आधा भाग शिव का और आधा पार्वती का। शिव ने ब्रह्मा को मैथुनी सृष्टि का ज्ञान दिया जिससे स्त्री-पुरुष सृष्टि के माध्यम से सृष्टि आगे बढ़े।
दार्शनिक अर्थ — अर्धनारीश्वर रूप यह दर्शाता है कि शिव और शक्ति अभिन्न हैं — पुरुष और प्रकृति, चेतना और ऊर्जा, एक ही परमसत्ता के दो रूप हैं। शिव पुराण में कहा गया है कि यदि शिव और पार्वती यह स्वरूप धारण नहीं करते तो सृष्टि आज भी विरान रहती।





