विस्तृत उत्तर
भगवान अर्धनारीश्वर का स्वरूप शैव-शाक्त दर्शन के हृदय में स्थित वह परम प्रतीक है जो ब्रह्मांड की मूल प्रकृति — पुरुष (चेतना) और प्रकृति (ऊर्जा) के शाश्वत, अविभाज्य एकत्व को दर्शाता है।
यह स्वरूप केवल एक मूर्तिमान देवता नहीं है, अपितु शैव सिद्धांत में वर्णित परम तत्व का सर्वोच्च प्रतीक है। इस स्वरूप की उपासना साधक को सृष्टि के द्वैत से परे अद्वैत की अनुभूति कराती है।
इस स्वरूप में दाहिना भाग शिव का है — श्वेत, भस्म से लिप्त, जटाधारी, त्रिनेत्र, सर्प आभूषणों से सुसज्जित। बायाँ भाग शक्ति का है — चम्पा के समान गौर वर्ण, कुमकुम और रत्न आभूषणों से मंडित, दिव्य नेत्रों वाली।





