विस्तृत उत्तर
गौरी-शंकर का पूजन केवल पति-पत्नी के बाह्य योग का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह साधक के आंतरिक शिव (पुरुष) और शक्ति (प्रकृति) के मिलन को दर्शाता है।
यह वह प्रक्रिया है जहाँ व्यक्ति के मन की आंतरिक ऊर्जा का संतुलन (लेफ्ट और राइट एनर्जी का बैलेंस) स्थापित होता है। जब साधक के भीतर यह संतुलन बनता है, तो वह स्वयं में पूर्ण होने लगता है।
यह आंतरिक संतुलन ही दांपत्य सुख का मूल कारण है, क्योंकि यह साधक को आत्म-पूर्णता की ओर ले जाता है।





