विस्तृत उत्तर
तंत्र शास्त्र की दृष्टि में यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड स्वयं शिव और शक्ति का ही साकार रूप है।
जब सब कुछ दिव्य चेतना से ही बना है, तो फिर कोई भी वस्तु अपवित्र या अशुद्ध कैसे हो सकती है? पवित्रता और अपवित्रता का भेद केवल सीमित मानवीय मन की उपज है, जो अज्ञान (अविद्या) का एक रूप है।
तंत्र का साधक इसी द्वैत-बुद्धि से ऊपर उठने का प्रयास करता है।
शव-साधना उस साधक के अद्वैत-दर्शन की अंतिम और सबसे कठिन परीक्षा है, जहाँ उसे मृत्यु के साक्षात प्रतीक, शव में भी अपने आराध्य शिव का ही दर्शन करना होता है।





