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तांत्रिक विश्व दृष्टि और तीन भाव⏱ 1 मिनट पठन

तंत्र शास्त्र में पवित्र और अपवित्र का भेद क्यों नहीं

तंत्र के अनुसार सम्पूर्ण ब्रह्मांड शिव-शक्ति का रूप है — सब कुछ दिव्य चेतना से बना है इसलिए कुछ भी अपवित्र नहीं।

संक्षिप्त उत्तर

तंत्र के अनुसार सम्पूर्ण ब्रह्मांड शिव-शक्ति का रूप है — सब कुछ दिव्य चेतना से बना है इसलिए कुछ भी अपवित्र नहीं। पवित्र-अपवित्र का भेद अज्ञान (अविद्या) की उपज है।

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विस्तृत उत्तर

तंत्र शास्त्र की दृष्टि में यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड स्वयं शिव और शक्ति का ही साकार रूप है।

जब सब कुछ दिव्य चेतना से ही बना है, तो फिर कोई भी वस्तु अपवित्र या अशुद्ध कैसे हो सकती है?

पवित्रता और अपवित्रता का भेद केवल सीमित मानवीय मन की उपज है, जो अज्ञान (अविद्या) का एक रूप है।

तंत्र का साधक इसी द्वैत-बुद्धि से ऊपर उठने का प्रयास करता है।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

तंत्र शास्त्र में पवित्र और अपवित्र का भेद क्यों नहीं है को संदर्भ सहित समझें

तंत्र शास्त्र में पवित्र और अपवित्र का भेद क्यों नहीं है का सबसे सीधा सार यह है: तंत्र के अनुसार सम्पूर्ण ब्रह्मांड शिव-शक्ति का रूप है — सब कुछ दिव्य चेतना से बना है इसलिए कुछ भी अपवित्र नहीं। पवित्र-अपवित्र का भेद अज्ञान (अविद्या) की...

तांत्रिक विश्व दृष्टि और तीन भाव जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.

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उत्तर पढ़ते समय यह देखें कि उसमें नियम, अपवाद और व्यवहारिक संदर्भ साफ हैं या नहीं।

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तांत्रिक विश्व दृष्टि और तीन भाव श्रेणी के दूसरे प्रश्न इस उत्तर की सीमा और उपयोग दोनों स्पष्ट करते हैं।

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तांत्रिक विश्व दृष्टि और तीन भाव प्रश्नोत्तर
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