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अविद्या से जुड़े सभी प्रश्न(14)

अविद्या पर शास्त्रीय व्याख्या, विधि, नियम, मंत्र और लाभ — सब एक ही स्थान पर। कुल 14 प्रश्न उपलब्ध हैं।

अविद्या

ब्रह्मा की पहली सृष्टि अविद्या से ग्रस्त क्यों कही गई?

पहली सृष्टि अविद्या से ग्रस्त कही गई क्योंकि सृष्टि-विचार सम्यक विचार के बिना हुआ और ब्रह्मा को मोह ने व्याप्त कर लिया।

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अविद्या

अविद्या के पांच प्रकार कौन से हैं?

अविद्या के पांच प्रकार तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अन्धतामिस्र बताए गए हैं।

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अविद्या

पंचपर्वा अविद्या क्या है?

पंचपर्वा अविद्या वे पांच अविद्याएँ हैं जो ब्रह्मा से पहले उत्पन्न हुईं: तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अन्धतामिस्र।

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लोक

तमस मोह महा मोह क्या है

तमस् देह-अज्ञान, मोह ममता और महा-मोह भोग-विलास की अंधी आसक्ति है।

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लोक

अंध तामिस्र क्या है

अंध-तामिस्र शरीर को ही सब कुछ मानने से उत्पन्न मृत्यु-भय है।

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लोक

तामिस्र क्या है

तामिस्र वह अज्ञान है जिसमें जीव ईर्ष्या, क्रोध और स्वतंत्र भोक्ता-भाव में फँसता है।

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लोक

ब्रह्मा ने अविद्या क्यों बनाई

ब्रह्मा ने जीवों को कर्मफल भोगने योग्य भौतिक जगत में बाँधने के लिए अविद्या रची।

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लोक

नन्दक खड्ग किसका प्रतीक है?

नन्दक ज्ञान और अविद्या-विनाश का प्रतीक है।

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लोक

शिव पुराण में सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा जी पर अविद्या का प्रभाव क्या दर्शाता है?

शिव पुराण का यह प्रसंग दर्शाता है — सृष्टि की इच्छा भी अविद्या है। सत्यलोक में भी जब तक सृष्टि-इच्छा है तब तक माया का सूक्ष्म प्रभाव रहता है। तप और शिव-कृपा से ही इसे पार किया जा सकता है।

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लोक

शिव पुराण में सत्यलोक का क्या वर्णन है?

शिव पुराण में ब्रह्मा जी शिव की आज्ञा से सत्यलोक में हैं। यहाँ सृष्टि के आरंभ में अविद्या के पाँच आवरण का प्रसंग और तपोलोक से 84,000 योजन की दूरी का उल्लेख है।

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तांत्रिक विश्व दृष्टि और तीन भाव

तंत्र शास्त्र में पवित्र और अपवित्र का भेद क्यों नहीं है?

तंत्र के अनुसार सम्पूर्ण ब्रह्मांड शिव-शक्ति का रूप है — सब कुछ दिव्य चेतना से बना है इसलिए कुछ भी अपवित्र नहीं। पवित्र-अपवित्र का भेद अज्ञान (अविद्या) की उपज है।

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शव साधना परिचय

शव साधना का दार्शनिक आधार क्या है?

तंत्र दर्शन: सम्पूर्ण ब्रह्मांड शिव-शक्ति का रूप है — पवित्र-अपवित्र का भेद अविद्या है। शव साधना उस साधक की परीक्षा है जो शव में भी शिव का दर्शन करता है।

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भक्ति एवं आध्यात्म

माया क्या है शंकराचार्य के अनुसार?

शंकराचार्य के अनुसार माया वह अनिर्वचनीय शक्ति है जो ब्रह्म के एकमात्र सत्य को आच्छादित करके जगत की मिथ्या प्रतीति कराती है। ज्ञान से ही माया का पर्दा हटता है।

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दर्शन

माया क्या है शंकराचार्य के अनुसार?

माया = वह शक्ति जिससे एक ब्रह्म अनेक (जगत) दिखता है। न सत् न असत् — 'अनिर्वचनीय।' दो शक्तियाँ: आवरण (सत्य ढकना) और विक्षेप (भ्रम दिखाना)। जादूगर का जादू जैसी — ब्रह्म अप्रभावित। ब्रह्मज्ञान से माया नष्ट = मोक्ष।

#माया#शंकराचार्य#अद्वैत
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