विस्तृत उत्तर
शिव पुराण (२.१.१५) में एक अत्यंत गहरा और दार्शनिक प्रसंग है। स्वयं ब्रह्मा जी कथन करते हैं कि वे भगवान शिव की आज्ञा से सृष्टि की रचना के उद्देश्य से सत्यलोक में निवास कर रहे थे। जब वे सृष्टि करने के इच्छुक हुए तब तमोगुण से युक्त अविद्या के पाँच आवरण उनके समक्ष प्रकट हुए। यह प्रसंग कई दार्शनिक प्रश्नों को उठाता है। पहला — सत्यलोक विशुद्ध सत्वगुण का लोक है फिर भी सृष्टि के आरंभ में अविद्या कैसे? इसका उत्तर यह है कि सृष्टि करने की इच्छा ही अपने आप में एक प्रकार की माया है। दूसरा — यह दर्शाता है कि सर्वोच्च लोक में रहते हुए भी जब तक जीव सृष्टि की इच्छा रखता है तब तक माया का सूक्ष्म प्रभाव कार्य करता है। ब्रह्मा जी को अपने तप और शिव-कृपा से इसे पार करना पड़ता है।
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