विस्तृत उत्तर
आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत में माया का सिद्धांत अत्यंत गहन और रहस्यमय है। शंकराचार्य ने माया को 'अनिर्वचनीय' कहा है — अर्थात इसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता।
माया न सत्य है, न असत्य। यह ब्रह्म से भिन्न भी नहीं है, अभिन्न भी नहीं है। यह वह शक्ति है जिसके कारण एकमात्र सत्य ब्रह्म में नाम और रूप का आरोप होता है — यानी ब्रह्म ही विभिन्न जीवों और पदार्थों के रूप में दिखाई देता है।
माया के दो रूप हैं — आवरण शक्ति और विक्षेप शक्ति। आवरण शक्ति आत्मा के सच्चे स्वरूप को ढक देती है — इसी को 'अविद्या' भी कहते हैं। विक्षेप शक्ति उस ढके हुए स्थान पर मिथ्या जगत का प्रक्षेप करती है। जैसे रस्सी को अंधेरे में साँप समझ लिया जाए — रस्सी का सच छुप जाता है और साँप का भ्रम हो जाता है।
शंकराचार्य का प्रसिद्ध सूत्र है — 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या' — ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है, यह जगत जो दिख रहा है वह माया का खेल है। इसका अर्थ यह नहीं कि जगत है ही नहीं, बल्कि यह है कि जगत का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं — वह ब्रह्म पर आश्रित है।
माया से मुक्ति का उपाय ज्ञान है — 'अहं ब्रह्मास्मि' की अनुभूति होते ही माया का पर्दा उठ जाता है और जीव को अपनी ब्रह्मस्वरूपता का बोध होता है।





