विस्तृत उत्तर
अंध-तामिस्र पंचपर्वा अविद्या का वह रूप है जिसमें जीव शरीर को ही अपना वास्तविक अस्तित्व मान लेता है। जब मनुष्य सोचता है कि शरीर के अंत के साथ सब कुछ समाप्त हो जाएगा, तब मृत्यु का तीव्र भय उत्पन्न होता है। यही अंध-तामिस्र है। यह अज्ञान आत्मा की नित्य सत्ता को ढक देता है और जीव को शरीर, आयु और सुरक्षा के भय में बाँध देता है। हंस अवतार का उपदेश इस भ्रम को दूर करता है। भगवान बताते हैं कि आत्मा जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और शरीर से भी अलग साक्षी है; इसलिए उसका वास्तविक नाश नहीं होता।
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