विस्तृत उत्तर
पशु-भाव वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति सामाजिक नियमों, भय, लज्जा और घृणा जैसे बंधनों (पाश) में जकड़ा रहता है।
वह पारंपरिक शुद्ध-अशुद्ध के भेद को मानता है और उसकी साधना भी इन्हीं सीमाओं में बंधी रहती है।
पशु-भाव वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति सामाजिक नियमों, भय, लज्जा और घृणा के बंधनों (पाश) में जकड़ा रहता है — वह शुद्ध-अशुद्ध के भेद को मानता है और साधना इन्हीं सीमाओं में रहती है।
पशु-भाव वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति सामाजिक नियमों, भय, लज्जा और घृणा जैसे बंधनों (पाश) में जकड़ा रहता है।
वह पारंपरिक शुद्ध-अशुद्ध के भेद को मानता है और उसकी साधना भी इन्हीं सीमाओं में बंधी रहती है।
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