विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में नरक में जीव के बंधन का स्पष्ट वर्णन मिलता है। वैतरणी नदी और यममार्ग के वर्णन में यह उल्लेख है:
कुछ पापी पाश में बंधे होते हैं, कुछ अंकुश में फंसाकर खींचे जाते हैं, कुछ कोओं द्वारा खींचे जाते हैं। वे पापी गरदन, हाथ और पैरों में जंजीरों से बंधे होते हैं। उनकी पीठ पर लोहे के भार होते हैं।
बंधन के प्रकार — पाश (रस्सी का फंदा), जंजीरें (गले, हाथ और पैरों पर), अंकुश (हुक), लोहे के भार (पीठ पर)।
बंधन का उद्देश्य — नरक में जीव भागे नहीं, यातना से बचे नहीं — इसलिए उसे बाँधा जाता है। यह उन्हीं बंधनों का प्रतिरूप है जिनमें वह जीवन भर पाप करते हुए बँधा रहा।
गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि यमदूत के पाश में यमलोक से पहले ही जीव बँध जाता है — और नरक में जाने पर वह बंधन और भी कठोर हो जाता है।
प्रतीकात्मक अर्थ — ये बंधन जीव के पापकर्मों, मोह और अहंकार का स्थूल प्रतीक हैं।





