विस्तृत उत्तर
दिव्य-भाव वह अवस्था है जब साधक समस्त संघर्षों से पार होकर सहज ही दिव्यता, प्रेम और करुणा में स्थित हो जाता है।
दिव्य भाव क्या होता है को संदर्भ सहित समझें
दिव्य भाव क्या होता है का सबसे सीधा सार यह है: दिव्य-भाव वह अवस्था है जब साधक समस्त संघर्षों से पार होकर सहज ही दिव्यता, प्रेम और करुणा में स्थित हो जाता है।
तांत्रिक विश्व दृष्टि और तीन भाव जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.
इसी विषय पर 5 संबंधित प्रश्न और 6 विस्तृत लेख भी उपलब्ध हैं। इसलिए इस उत्तर को शुरुआती निष्कर्ष मानें और नीचे दिए गए अगले पन्नों से पूरा संदर्भ जोड़ें।
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तांत्रिक विश्व दृष्टि और तीन भाव श्रेणी के दूसरे प्रश्न इस उत्तर की सीमा और उपयोग दोनों स्पष्ट करते हैं।
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इसी विषय के 5 प्रश्न
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शव साधना किस भाव के साधक की साधना है?
शव साधना वीर-भाव के साधक की सर्वोच्च परीक्षा है — यह उस साधक के लिए है जो शुद्ध-अशुद्ध के भेद से ऊपर उठकर शव में भी शिव का दर्शन करने की क्षमता रखता है।
वीर भाव क्या होता है?
वीर-भाव में साधक भीतर के अंधकार, भय और घृणा का सीधे सामना करता है — वर्जित परिस्थितियों में भी समभाव रखकर द्वैत जीतने की कठोर साधना करता है। शव साधना इसी की सर्वोच्च परीक्षा है।
पशु भाव क्या होता है?
पशु-भाव वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति सामाजिक नियमों, भय, लज्जा और घृणा के बंधनों (पाश) में जकड़ा रहता है — वह शुद्ध-अशुद्ध के भेद को मानता है और साधना इन्हीं सीमाओं में रहती है।
तंत्र शास्त्र साधकों को कितने भावों में वर्गीकृत करता है?
तंत्र शास्त्र साधकों को तीन भावों में वर्गीकृत करता है: (1) पशु-भाव — बंधनों में जकड़ा, (2) वीर-भाव — भय का सीधा सामना करने वाला, (3) दिव्य-भाव — दिव्यता-प्रेम-करुणा में स्थित।
तंत्र शास्त्र में पवित्र और अपवित्र का भेद क्यों नहीं है?
तंत्र के अनुसार सम्पूर्ण ब्रह्मांड शिव-शक्ति का रूप है — सब कुछ दिव्य चेतना से बना है इसलिए कुछ भी अपवित्र नहीं। पवित्र-अपवित्र का भेद अज्ञान (अविद्या) की उपज है।
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