विस्तृत उत्तर
श्रीरामजी ने शिवजी के धनुष को अत्यन्त सहजता से (बिना किसी प्रयास के) उठा लिया — जबकि दस हज़ार राजा मिलकर भी उसे हिला नहीं सके थे।
बालकाण्ड में कहा — रामजी सभामें धनुषके निकट गये। देखते ही सबके मनमें विश्वास हो गया कि रामजी ही धनुष तोड़ेंगे। उन्होंने सहज भाव से धनुष उठाया, प्रत्यंचा (तागा) चढ़ाई, खींचा और धनुष बीच से टूट गया।
सोरठा — 'संकर चापु जहाजु सागरु रघुबर बाहुबलु। बूड़ सो सकल समाजु चढ़ा जो प्रथमहिं मोह बस॥'
अर्थ — शिवजीका धनुष जहाज है और श्रीरामचन्द्रजीकी भुजाओंका बल समुद्र है। (धनुष टूटनेसे) वह सारा समाज डूब गया, जो मोहवश पहले इस जहाजपर चढ़ा था।





