विस्तृत उत्तर
विश्वामित्रजी ने शुभ समय जानकर अत्यन्त प्रेमभरी वाणी बोले — 'उठहु राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा' — हे राम! उठो, शिवजीका धनुष तोड़ो और हे तात! जनकका सन्ताप मिटाओ।
इसका अर्थ — विश्वामित्रजीने शुभ मुहूर्त जानकर रामजी से कहा कि अब समय आ गया है, उठो और भवचाप (शिवजी का धनुष) तोड़कर जनक की चिन्ता दूर करो। 'भवचाप' = भव (शिवजी) का चाप (धनुष)। गुरु की इस एक आज्ञा पर रामजी उठे और सहज भाव से धनुष तोड़ दिया।





