विस्तृत उत्तर
इसका अर्थ — तुलसीदासजी कहते हैं कि जब सबको निश्चय हो गया कि श्रीरामजीने कोदण्ड (शिवजी के धनुष) को खण्डित (तोड़) डाला, तब सब 'जयति' (जय हो) के वचन उच्चारने लगे — अर्थात् सब लोग 'श्रीरामचन्द्रजी की जय' बोलने लगे।
यह छन्द धनुष भंग के क्षण का वर्णन करता है — भयंकर ध्वनि, लोक काँपे, दिग्गज डगमगाये, सूर्य के घोड़े भटके — और जब सबको समझ आया कि राम ने धनुष तोड़ दिया, तब जयकार गूँज उठी।





