विस्तृत उत्तर
इसका अर्थ — घोर (भयंकर) और कठोर (कड़ी) ध्वनि से सब भुवन (लोक) भर गये। सूर्य के रथ के घोड़े (रबि बाजि) अपना मार्ग छोड़कर (तजि मारगु) इधर-उधर चलने लगे।
आगे — 'चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले' — दिशाओं के हाथी (दिग्गज) चिंघाड़ने लगे, पृथ्वी डोलने लगी, शेषनाग (अहि), वाराह (कोल) और कच्छप (कूरुम) कलमला उठे।
यह छन्द धनुष टूटने की भयंकर ध्वनि का प्रभाव बताता है — सारी सृष्टि काँप उठी, पृथ्वी के आधार (शेष, वाराह, कच्छप) भी विचलित हो गये।





