विस्तृत उत्तर
तामिस्र पंचपर्वा अविद्या का एक रूप है। इसका संबंध ईर्ष्या, क्रोध और स्वतंत्र भोक्ता बनने की वृत्ति से है। जब जीव यह भूल जाता है कि वह परमात्मा का अंश और सेवक है, तब वह स्वयं को स्वतंत्र स्वामी और भोगी मानने लगता है। दूसरों के सुख, अधिकार या सामर्थ्य को देखकर उसके भीतर ईर्ष्या और क्रोध पैदा होते हैं। यही तामिस्र है। यह अज्ञान जीव को परमात्मा से दूर और अहंकार के निकट ले जाता है। हंस अवतार का आत्मज्ञान बताता है कि जीव का वास्तविक स्वरूप देह या अहंकार नहीं, बल्कि साक्षी चेतना है।
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