विस्तृत उत्तर
हाँ, आंतरिक ऊर्जा के संतुलन के माध्यम से यह साधना साधक के मानसिक और भावनात्मक केंद्र को स्थिर करती है, जिससे विवाह कारक ग्रहों (विशेषतः शुक्र) से जुड़े दोषों के प्रभाव कम हो जाते हैं।
यदि कुंडली में कोई दोष या कमजोरी होती है, तो मंदिरों में पुरोहितों द्वारा शुक्र पूजा के साथ गौरी-शंकर पूजा की विधियाँ कराई जाती हैं, जिससे लोगों को सहायता मिली है और उनके कार्य सिद्ध हुए हैं।





