विस्तृत उत्तर
कीर्तन में नाचना — यह भक्ति की सबसे स्वाभाविक और सहज अभिव्यक्ति है। मीराबाई ने मंदिर में नाचा, चैतन्य महाप्रभु ने नाम-संकीर्तन करते हुए नाचा — यह परंपरा अत्यंत प्राचीन है।
नाचने से भक्ति गहरी क्यों होती है — इसके कई कारण हैं।
पहला — शरीर का भी साधन बनना। जब केवल मन और वाणी नाम लेते हैं तो भक्ति का अनुभव आधा रहता है। लेकिन जब शरीर भी नाचने लगता है, तो तीनों — मन, वाणी और शरीर — एकसाथ भगवान को समर्पित हो जाते हैं। यह पूर्ण समर्पण है।
दूसरा — अहंकार का विसर्जन। नाचना एक ऐसी क्रिया है जिसमें 'लोग क्या सोचेंगे' का विचार छोड़ना पड़ता है। जब भक्त कीर्तन में लोक-लाज छोड़कर नाचता है, तो वह अहंकार के एक बड़े हिस्से को तोड़ता है — यही भक्ति का प्रवेश-द्वार है।
तीसरा — प्राण-शक्ति का जागरण। नृत्य में लयबद्ध गति से शरीर में प्राण-वायु का संचार होता है, नाड़ियाँ उद्दीप्त होती हैं। यह स्थिति ध्यान जैसी होती है — मन और शरीर एक लय में होते हैं।
चौथा — आनंद की अभिव्यक्ति। जब भीतर से आनंद उमड़ता है तो शरीर थिरकने लगता है — यह भगवत-कृपा का संकेत है। मीराबाई को भी यही हुआ — 'पग घुंघरू बाँध मीरा नाची रे।'





