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विस्तृत उत्तर
सनकादि ऋषियों ने भगवान विष्णु के वैकुण्ठ द्वारपाल जय और विजय को श्राप दिया था। वे भगवान नारायण के दर्शन के लिए वैकुण्ठ पहुँचे थे और छह द्वार पार कर चुके थे। सप्तम द्वार पर जय-विजय ने उन्हें बालक समझकर रोक दिया। मुनियों ने इसे वैकुण्ठ के शुद्ध वातावरण में द्वैत और अहंकार का दोष माना। इसी कारण उन्होंने जय-विजय को भौतिक जगत में असुर योनि में जन्म लेने का श्राप दिया।
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