श्लोक अर्थ: यह मानव शरीर ही देवालय है और भीतर बैठा जीव ही सदाशिव है। केवल अज्ञान रूपी निर्माल्य (कूड़ा) त्यागना है। अज्ञान हटते ही 'सोऽहं' (मैं ही शिव हूँ) की परम अद्वैत पूर्णता प्राप्त होती है — यही
पशुपतिनाथ की स्तुति का यह श्लोक शिव दर्शन का सार प्रस्तुत करता है: 'देही देवालयः प्रोक्तो जीवो देवः सदाशिवः।
त्यजेदज्ञाननिर्माल्यम सोहं भावेन पूजयते। ' अर्थात् यह मानव शरीर ही देवालय है और इसके भीतर बैठा जीव ही सदाशिव है।