विस्तृत उत्तर
पशुपतिनाथ की स्तुति का यह श्लोक शिव दर्शन का सार प्रस्तुत करता है:
देही देवालयः प्रोक्तो जीवो देवः सदाशिवः। त्यजेदज्ञाननिर्माल्यम सोहं भावेन पूजयते।।
अर्थात् यह मानव शरीर ही देवालय है और इसके भीतर बैठा जीव ही सदाशिव है। मनुष्य को केवल अज्ञान रूपी निर्माल्य (कूड़े) को त्यागना है, और अज्ञान का आवरण हटते ही प्रत्येक मनुष्य 'सोऽहं' (मैं ही शिव हूँ) की उस परम और अद्वैत पूर्णता को प्राप्त कर लेता है, जहाँ द्वैत का अंत हो जाता है और केवल अनंत शिव तत्त्व ही शेष रहता है।
यही शिव महापुराण और वेदों का अंतिम लक्ष्य और परम उपदेश है।





