विस्तृत उत्तर
आत्मविद्या से अज्ञान दीपक और अंधकार की तरह नष्ट होता है। पाठ में योगी को आत्मविद्यारूप स्वस्थ और अचल दीपक से समाधिस्थ होकर पाताल तक के पदार्थ देखने वाला कहा गया है। फिर कहा गया है कि प्रसादरूप अमृत से पूर्ण सत्त्वपात्र में स्थित आत्मविद्यारूप प्रदीप से वह अज्ञानान्धकार को नष्ट करके अपने भीतर साक्षात् ईश्वर का दर्शन करता है। इसलिए आत्मविद्या आंतरिक ईश्वर-दर्शन का प्रकाश बनती है।
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