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विस्तृत उत्तर
योगी अपने शरीर में ब्रह्मलोक तक देखता है क्योंकि योगजनित धर्मरूप संसर्ग से उसका अनुभव विस्तृत हो जाता है। पाठ में कहा गया है कि इस योगजनित धर्मरूप संसर्ग से योगी लोग इस जगत में ब्रह्मलोकपर्यन्त जो कुछ है, उसे अपने देह में स्थित देखते हैं। यह साधक की सूक्ष्म अनुभूति और योग से उत्पन्न व्यापक दर्शन का वर्णन है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 9, PDF पृष्ठ 53, श्लोक 21-22
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