धर्म = 'धृ' धातु — जो धारण करे/टिकाए। कर्तव्य + नैतिकता + सही आचरण। मनुस्मृति: 10 लक्षण (धैर्य, क्षमा, सत्य, अहिंसा...)। कणाद: जो उन्नति और मोक्ष दे। महाभारत: 'अहिंसा परमो धर्मः'। गीता: स्वधर्म ही श्र
धर्म का अर्थ क्या है? शब्द-व्युत्पत्ति: 'धर्म' = संस्कृत 'धृ' धातु से — जो धारण करे, जो टिकाए, जो समाज और सृष्टि को संतुलित रखे।
धर्म केवल पूजा-पद्धति या मज़हब नहीं — यह सही आचरण, कर्तव्यबोध और नैतिक जीवन-पद्धति है। प्रमुख परिभाषाएँ: 1।