धूमावती साधना हमेशा अमावस्या या मध्यरात्रि में एकांत स्थानों पर की जाती है। गृहस्थों के लिए इस मंत्र का जप वर्जित माना गया है, यह मुख्यतः संन्यासियों के लिए है।
माता धूमावती दस महाविद्याओं में सातवीं विद्या हैं। उन्हें 'अलक्ष्मी' या ज्येष्ठा भी कहा जाता है।
उनका स्वरूप एक अत्यंत वृद्ध, भूखी, विधवा स्त्री का है जो कौए वाले रथ पर सवार हैं।