ध्यान में 'सोचना' नहीं — एकाग्र होना है। पतञ्जलि: एक विषय पर अखंड प्रवाह = ध्यान। करें: इष्ट-मूर्ति, मंत्र-ध्वनि, श्वास-दर्शन, प्रकाश-ध्यान। न करें: योजना, चिंता, कल्पना। गीता (6.25): 'किसी का भी चिंत
शास्त्रों के अनुसार ध्यान में 'सोचना' नहीं, बल्कि एकाग्र होना है। मूल सिद्धांत: पतञ्जलि योगसूत्र (3। 2): 'तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्।
' — एक ही विषय पर अखंड प्रवाह ध्यान है। ध्यान में विचारों की बहुलता नहीं होती।