पतंजलि के अनुसार 'तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्' — धारणा के स्थान पर चित्त का निरंतर एकाग्र प्रवाह ध्यान है। यह अष्टांग योग का सातवाँ अंग है जिसमें मन किसी एक विषय पर बिना बाधा के केंद्रित रहता है।
ध्यान का स्वरूप ध्यान योग का सातवाँ अंग है।
पतंजलि के योगसूत्र (3/2) में कहा गया है: > 'तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्' अर्थात् — धारणा के स्थान पर चित्त का निरंतर एकाग्र प्रवाह ध्यान है।