विस्तृत उत्तर
## ध्यान का स्वरूप
ध्यान योग का सातवाँ अंग है। पतंजलि के योगसूत्र (3/2) में कहा गया है:
> 'तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्'
अर्थात् — धारणा के स्थान पर चित्त का निरंतर एकाग्र प्रवाह ध्यान है।
### सरल परिभाषा
चित्त को एकाग्र करके किसी एक वस्तु, देवता, मंत्र या परमात्मा पर केंद्रित कर देना ध्यान कहलाता है।
### धारणा और ध्यान का अंतर
| धारणा | ध्यान |
|-------|-------|
| चित्त को किसी स्थान पर स्थिर करने का प्रयास | उस स्थान पर चित्त का निरंतर निर्बाध प्रवाह |
| प्रयत्नसापेक्ष | प्रयत्नरहित, स्वाभाविक |
### भगवद्गीता में ध्यान
गीता के छठे अध्याय (ध्यानयोग) में श्रीकृष्ण ने कहा:
> मन को संयमित, उत्तेजनारहित व शांत करते हुए उसे ईश्वर के चिंतन में लगाना चाहिए। इस प्रकार परम शांति प्राप्त होती है।
### ध्यान की विधियाँ
- ▸इष्टदेव या गुरु की धारणा करके उसमें ध्यान केंद्रित करना
- ▸श्वास-उच्छ्वास की क्रिया पर ध्यान
- ▸हृदय या भ्रूमध्य पर केंद्रित करना
- ▸मंत्र के साथ ध्यान
### ध्यान का समय
ब्राह्ममुहूर्त (प्रातः 4-6 बजे) ध्यान के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
### ध्यान का परिणाम
निरंतर ध्यान से चित्त शांत होता है (चित्तशुद्धि), फिर समाधिदशा प्राप्त होती है जो मोक्ष का द्वार है। ऐसा साधक जो योगी निरंतर ध्यान करता है, परम शांति और मोक्ष को प्राप्त करता है।




