विस्तृत उत्तर
पतंजलि योग सूत्र (साधनपाद 2.32) में अष्टांग योग के दूसरे अंग 'नियम' के पांच प्रकार बताए गए हैं।
मूल सूत्र
*शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः॥ (2.32)*
— शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान — ये पांच नियम हैं।
पांच नियम विस्तार से
- 1शौच (Cleanliness/पवित्रता):
- ▸बाह्य शौच — शरीर, वस्त्र, आहार और वातावरण की स्वच्छता।
- ▸आंतरिक शौच — मन की शुद्धि, राग-द्वेष-ईर्ष्या से मुक्ति।
- ▸योग सूत्र (2.40): शौच से स्वयं के शरीर के प्रति वैराग्य और दूसरों से असंसर्ग (अनावश्यक संपर्क से दूरी) उत्पन्न होता है।
- 1संतोष (Contentment/संतुष्टि):
- ▸जो प्राप्त है उसमें संतुष्ट रहना — न अत्यधिक लालसा, न शिकायत।
- ▸योग सूत्र (2.42): संतोष से अनुपम (परम) सुख की प्राप्ति होती है।
- 1तप (Austerity/तपस्या):
- ▸शारीरिक और मानसिक अनुशासन। सुख-दुख, मान-अपमान, सर्दी-गर्मी जैसे द्वंद्वों को समभाव से सहना तप है।
- ▸उपवास, व्रत, चांद्रायण आदि शारीरिक तप हैं।
- ▸योग सूत्र (2.43): तप से शरीर और इंद्रियों की शुद्धि होती है, अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
- 1स्वाध्याय (Self-study/आत्मचिंतन):
- ▸दो अर्थ: (क) वेद, उपनिषद, गीता जैसे मोक्षशास्त्रों का अध्ययन, (ख) प्रणव (ॐ) और गायत्री मंत्र का जप।
- ▸आत्मचिंतन — 'मैं कौन हूँ' इस प्रश्न पर विचार।
- ▸योग सूत्र (2.44): स्वाध्याय से इष्ट देवता का साक्षात्कार होता है।
- 1ईश्वर प्रणिधान (Surrender to God/ईश्वर समर्पण):
- ▸सभी कर्मों का फल ईश्वर को समर्पित करना — बिना किसी फल की कामना।
- ▸पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ ईश्वर के प्रति समर्पण।
- ▸योग सूत्र (2.45): ईश्वर प्रणिधान से समाधि की सिद्धि होती है।
संदर्भ: ये पांच नियम अष्टांग योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि) का दूसरा अंग हैं। यम = सामाजिक अनुशासन, नियम = व्यक्तिगत अनुशासन। पतंजलि के अनुसार योग सूत्र (2.1) में तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान को मिलाकर 'क्रियायोग' कहा गया है।





