विस्तृत उत्तर
## योग की परिभाषा
योग संस्कृत की 'युज्' धातु से बना है जिसका अर्थ है — *जोड़ना, मिलाना, संयुक्त करना।* इसका सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है, और कठोपनिषद में इसे आधुनिक अर्थ में पहली बार प्रयुक्त किया गया।
### महर्षि पतंजलि की परिभाषा
महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र (1.2) में कहा:
> योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः
अर्थात् — चित्त की वृत्तियों (मानसिक विचार-तरंगों) के निरोध का नाम योग है।
### भगवद्गीता में योग
श्रीकृष्ण ने गीता में कहा:
- ▸'योगः कर्मसु कौशलम्' (2.50) — कर्मों में कुशलता ही योग है
- ▸गीता में चार प्रमुख योग वर्णित हैं: ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग और राजयोग
### पतंजलि का अष्टांग योग
महर्षि पतंजलि ने योग के आठ अंग (अष्टांग) बताए — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
| अंग | अर्थ |
|-----|------|
| यम | सामाजिक संयम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) |
| नियम | व्यक्तिगत अनुशासन (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान) |
| आसन | स्थिर व सुखद शारीरिक स्थिति |
| प्राणायाम | श्वास का नियमन |
| प्रत्याहार | इंद्रियों को विषयों से वापस लेना |
| धारणा | चित्त को एक स्थान पर स्थिर करना |
| ध्यान | उसी में निरंतर प्रवाह |
| समाधि | ध्येय में पूर्ण लीनता — योग की चरम अवस्था |
### योग के प्रकार
- ▸मंत्रयोग — मंत्र जप द्वारा
- ▸लययोग — निरंतर ईश्वर-स्मरण
- ▸हठयोग — शरीर और प्राण की साधना
- ▸राजयोग — चित्त की साधना (पतंजलि का अष्टांग)
### योग का उद्देश्य
योग का अंतिम लक्ष्य कैवल्य (मोक्ष) है — आत्मा और परमात्मा का मिलन, या चित्त का पूर्ण शुद्धिकरण।
> 'योगादेव तु कैवल्यम्' — योग से ही कैवल्य प्राप्त होता है।





