ध्यान अनुभव
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ध्यान में ईश्वर के साथ एकत्व का अनुभव कैसा होता है?
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संक्षिप्त उत्तर
'अहं ब्रह्मास्मि' = अनुभव। सर्वत्र ईश्वर (सब=एक=मैं)। अनंत प्रेम, शांति, आनंद अश्रु, शब्दहीन। 'तत् त्वम् असि' (छांदोग्य)। 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म।' दुर्लभ → स्थिर=जीवनमुक्ति।
ईश्वर एकत्व = अद्वैत — शब्दातीत (फिर भी): अनुभव: 1। 'मैं = वो, वो = मैं': 'अहं ब्रह्मास्मि' (बृहदारण्यक) = अनुभव, शब्द नहीं।
सर्वत्र ईश्वर: पत्थर/पेड़/व्यक्ति/आकाश = सब = एक = मैं = ईश्वर। अनंत प्रेम: प्रेम × ∞ — सबसे प्रेम, सबमें प्रेम, प्रेम ही प्रेम।
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