'मैं' विलुप्त, सर्वव्यापी, सत्-चित्-आनंद, भय शून्य। मुंडक: 'ब्रह्मविद् ब्रह्म भवति।' 'कुछ नहीं बदला+सब बदला।' जीवनमुक्ति: 'कमल=कीचड़ में, जल नहीं छूता।'
मोक्ष = शब्दों से परे — फिर भी संकेत: 1। 'मैं' विलुप्त: कर्ता/भोक्ता = नहीं। 'कौन मुक्त?' = कोई नहीं — 'मैं' ही बंधन था।
सर्वव्यापी: 'मैं = सब। सत्-चित्-आनंद: अस्तित्व+चेतना+आनंद = एक साथ = स्वभाव।