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ध्यान अनुभव📜 उपनिषद, अद्वैत वेदांत, पूर्व शोध ID 757/7761 मिनट पठन

ध्यान में मोक्ष का अनुभव कैसा होता है?

संक्षिप्त उत्तर

'मैं' विलुप्त, सर्वव्यापी, सत्-चित्-आनंद, भय शून्य। मुंडक: 'ब्रह्मविद् ब्रह्म भवति।' 'कुछ नहीं बदला+सब बदला।' जीवनमुक्ति: 'कमल=कीचड़ में, जल नहीं छूता।'

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विस्तृत उत्तर

मोक्ष = शब्दों से परे — फिर भी संकेत:

  1. 1'मैं' विलुप्त: कर्ता/भोक्ता = नहीं। 'कौन मुक्त?' = कोई नहीं — 'मैं' ही बंधन था।
  2. 2सर्वव्यापी: 'मैं = सब। सब = मैं।' सीमा = नहीं। अनंत।
  3. 3सत्-चित्-आनंद: अस्तित्व+चेतना+आनंद = एक साथ = स्वभाव।
  4. 4भय शून्य: मृत्यु/हानि/दुख = भय नहीं — 'मैं अमर हूं' = अनुभव (विश्वास नहीं)।
  5. 5उपनिषद: 'ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति' (मुंडक 3.2.9) — 'ब्रह्म जानने वाला ब्रह्म हो जाता है।'
  6. 6'कुछ नहीं बदला + सब बदल गया': बाहर = वही। भीतर = सम्पूर्ण परिवर्तन।

जीवनमुक्ति: शरीर = रहता है। संसार = रहता है। किन्तु 'मैं = संसार में नहीं' = मुक्त। 'कमल = कीचड़ में, जल नहीं छूता।'

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शास्त्रीय स्रोत
उपनिषद, अद्वैत वेदांत, पूर्व शोध ID 757/776
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