'मैं' विलुप्त, सर्वव्यापी, सत्-चित्-आनंद, भय शून्य। मुंडक: 'ब्रह्मविद् ब्रह्म भवति।' 'कुछ नहीं बदला+सब बदला।' जीवनमुक्ति: 'कमल=कीचड़ में, जल नहीं छूता।'
- 1'मैं' विलुप्त: कर्ता/भोक्ता = नहीं। 'कौन मुक्त?' = कोई नहीं — 'मैं' ही बंधन था।
- 2सर्वव्यापी: 'मैं = सब। सब = मैं।' सीमा = नहीं। अनंत।
- 3सत्-चित्-आनंद: अस्तित्व+चेतना+आनंद = एक साथ = स्वभाव।
- 4भय शून्य: मृत्यु/हानि/दुख = भय नहीं — 'मैं अमर हूं' = अनुभव (विश्वास नहीं)।
- 5उपनिषद: 'ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति' (मुंडक 3.2.9) — 'ब्रह्म जानने वाला ब्रह्म हो जाता है।'
- 6'कुछ नहीं बदला + सब बदल गया': बाहर = वही। भीतर = सम्पूर्ण परिवर्तन।