विस्तृत उत्तर
निर्विकल्प समाधि = ध्यान सर्वोच्च अवस्था:
अनुभव (शब्दों से परे — फिर भी)
- 1'मैं' नहीं: अहंकार = शून्य। 'मैं ध्यान कर रहा' = नहीं। केवल 'है।'
- 2विषय-वस्तु-ज्ञाता = एक: देखने वाला + दिखने वाला + देखना = एक।
- 3अनंत: समय/स्थान = नहीं। अनंत विस्तार। 'सब कुछ = मैं। मैं = सब कुछ।'
- 4परमानंद: सांसारिक सुख × ∞ = फिर भी कम। 'सत्-चित्-आनंद' = अनुभव।
- 5शब्दातीत: 'जो बोले = वो नहीं। जो है = वो बोल नहीं सकते।'
पतंजलि (1.3): 'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' — तब द्रष्टा (आत्मा) स्वरूप में स्थित।
दुर्लभ: जीवन में 1 क्षण = भी = कृतार्थ। स्थिर = अत्यंत दुर्लभ (विवेकानंद/रामकृष्ण)।

