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ध्यान अनुभव📜 पतंजलि योग सूत्र, अद्वैत वेदांत1 मिनट पठन

ध्यान में निर्विकल्प समाधि का अनुभव कैसा होता है?

संक्षिप्त उत्तर

'मैं' शून्य, विषय-वस्तु-ज्ञाता=एक, अनंत, सत्-चित्-आनंद, शब्दातीत। पतंजलि: 'द्रष्टा स्वरूप स्थित।' 1 क्षण = कृतार्थ। स्थिर = अत्यंत दुर्लभ (रामकृष्ण)।

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विस्तृत उत्तर

निर्विकल्प समाधि = ध्यान सर्वोच्च अवस्था:

अनुभव (शब्दों से परे — फिर भी)

  1. 1'मैं' नहीं: अहंकार = शून्य। 'मैं ध्यान कर रहा' = नहीं। केवल 'है।'
  2. 2विषय-वस्तु-ज्ञाता = एक: देखने वाला + दिखने वाला + देखना = एक।
  3. 3अनंत: समय/स्थान = नहीं। अनंत विस्तार। 'सब कुछ = मैं। मैं = सब कुछ।'
  4. 4परमानंद: सांसारिक सुख × ∞ = फिर भी कम। 'सत्-चित्-आनंद' = अनुभव।
  5. 5शब्दातीत: 'जो बोले = वो नहीं। जो है = वो बोल नहीं सकते।'

पतंजलि (1.3): 'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' — तब द्रष्टा (आत्मा) स्वरूप में स्थित।

दुर्लभ: जीवन में 1 क्षण = भी = कृतार्थ। स्थिर = अत्यंत दुर्लभ (विवेकानंद/रामकृष्ण)।

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शास्त्रीय स्रोत
पतंजलि योग सूत्र, अद्वैत वेदांत
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