विस्तृत उत्तर
शून्य = ध्यान सर्वोच्च — समाधि द्वार:
क्या है: विचार शून्य। इंद्रियां शून्य। अहंकार शून्य। 'मैं' नहीं — केवल 'है'। न प्रकाश, न अंधकार — शुद्ध चेतना।
पतंजलि: 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' (1.2) — चित्त वृत्ति (विचार) निरोध = योग = शून्य अवस्था।
अर्थ
- 1निर्विचार: विचार बंद = शून्य = ध्यान सफल।
- 2तुरीय: जाग्रत/स्वप्न/सुषुप्ति से परे = चौथी अवस्था = शून्य।
- 3ब्रह्म: शून्य = शून्य नहीं — पूर्ण = ब्रह्म = 'पूर्णमदः पूर्णमिदम्'।
- 4समाधि: शून्य = सविकल्प/निर्विकल्प समाधि का द्वार।
सावधानी: शून्य = नींद नहीं! जागरूक + शून्य = सच्चा ध्यान। नींद = तमस।





