ध्यान से संतुलन: गीता (6.33): 'समत्वं योग।' 5 स्तर: भावनात्मक (पर्यवेक्षक बनना), मानसिक (चंचलता कम), स्वास्थ्य (तंत्रिका-तंत्र शांत), सामाजिक (अहंकार कम), आत्मिक (सुख-दुःख समान)। अष्टावक्र: आत्म-बोध म
ध्यान से जीवन-संतुलन का संबंध 'समभाव' की प्राप्ति से है। 33): 'समत्वं योग उच्यते। ' — समभाव (सुख-दुःख में समान रहना) ही योग है।
ध्यान इस समभाव को विकसित करता है। संतुलन की पाँच भूमियाँ: 1।