दिव्यास्त्र तीन तरीकों से मिलते थे — देवताओं की कठोर तपस्या, देवताओं से सीधा वरदान, या द्रोणाचार्य जैसे गुरु से शिक्षा।
दिव्यास्त्रों को प्राप्त करने की प्रक्रिया अत्यंत कठोर और अनुशासित थी।
इन्हें केवल सीखा नहीं जा सकता था; इन्हें एक गुरु द्वारा एक योग्य शिष्य को तभी प्रदान किया जाता था जब शिष्य का चरित्र, अनुशासन और निष्ठा सिद्ध हो जाती थी।