विस्तृत उत्तर
दिव्यास्त्रों को प्राप्त करने की प्रक्रिया अत्यंत कठोर और अनुशासित थी। इन्हें केवल सीखा नहीं जा सकता था; इन्हें एक गुरु द्वारा एक योग्य शिष्य को तभी प्रदान किया जाता था जब शिष्य का चरित्र, अनुशासन और निष्ठा सिद्ध हो जाती थी। इसके लिए विशिष्ट मंत्रों में त्रुटिहीन उच्चारण और अटूट विश्वास के साथ महारत हासिल करना आवश्यक था। अस्त्र प्राप्त करने के मुख्य तरीके तीन थे — पहला, किसी देवता को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या करना; दूसरा, देवताओं से सीधे वरदान प्राप्त करना; और तीसरा, द्रोणाचार्य जैसे गुरु से शिक्षा लेना, जिन्होंने स्वयं ऋषियों की एक लंबी परंपरा से यह ज्ञान प्राप्त किया था।
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