हाँ, ईश्वर का साक्षात्कार संभव है — परंतु बाहरी आँखों से नहीं। कठोपनिषद कहता है कि सूक्ष्म बुद्धि और साधना से ही उनका दर्शन होता है। अनन्य भक्ति, ध्यान और अहंकार-विसर्जन इसके मार्ग हैं।
हाँ, ईश्वर को देखा जा सकता है — परंतु यह दर्शन बाहरी आँखों से नहीं, बल्कि साधना और भक्ति की परिपक्वता से होता है।
कठोपनिषद में कहा गया है — 'एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽत्मा न प्रकाशते। दृश्यते त्वग्रयया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः।