विस्तृत उत्तर
हाँ, ईश्वर को देखा जा सकता है — परंतु यह दर्शन बाहरी आँखों से नहीं, बल्कि साधना और भक्ति की परिपक्वता से होता है।
कठोपनिषद में कहा गया है — 'एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽत्मा न प्रकाशते। दृश्यते त्वग्रयया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः।।' अर्थात् यह परमात्मा सभी प्राणियों में छिपा है, किंतु सूक्ष्म बुद्धि वाले सूक्ष्मदर्शी साधकों को ही दिखता है।
श्वेताश्वतर उपनिषद में कहा गया है कि ईश्वर तिल में छिपे तेल की तरह हमारे शरीर में व्याप्त है — उसे सत्य और तपस्या से ही अनुभव किया जा सकता है।
भागवत परंपरा में भक्त प्रह्लाद ने खंभे से, अर्जुन ने साक्षात् विराट रूप देखा। श्री रामकृष्ण परमहंस ने नरेंद्र (विवेकानंद) से कहा था — 'जिस प्रकार मैं तुम्हें देखता हूँ, उसी प्रकार ईश्वर को भी देखा जा सकता है और उसके साथ बातें की जा सकती हैं — परंतु इसके लिए प्रयत्न कौन करता है?'
ईश्वर के साक्षात्कार के मुख्य मार्ग हैं — गहन ध्यान, अनन्य भक्ति, निष्काम सेवा और अहंकार का पूर्ण विसर्जन। शास्त्र कहते हैं कि जब भक्त का हृदय पूर्णतः शुद्ध हो जाता है, तो ईश्वर स्वयं प्रकट होते हैं। भगवान का तेज साधारण मानव की आँखें सहन नहीं कर सकतीं — इसलिए जब कीर्तन-नाम-स्मरण में आनंद आए और नेत्र आँसुओं से भर जाएं, तो वही उनके प्रकट होने का संकेत है।
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