दर्शन
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'जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्य' — का अर्थ क्या?
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संक्षिप्त उत्तर
शंकराचार्य (विवेकचूड़ामणि): ब्रह्म = परम सत्य, जगत = मिथ्या (न सत् न असत् — अनिर्वचनीय), जीव = ब्रह्म ही। 'मिथ्या' ≠ झूठा। रस्सी-साँप/स्वप्न उदाहरण। व्यावहारिक सत्ता (जगत सत्य) vs पारमार्थिक सत्ता (के
'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः' — यह आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत का सारवाक्य है।
अर्थ: - ब्रह्म सत्यम् — ब्रह्म ही एकमात्र परम सत्य है। - जगत् मिथ्या — यह दृश्य जगत (संसार) मिथ्या है।
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