रामचरितमानस — बालकाण्ड
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'जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि' — इस सोरठा का क्या अर्थ है?
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संक्षिप्त उत्तर
अर्थ — प्रेम की सुन्दर रीति देखो कि जल भी दूध के साथ मिलकर दूध के भाव बिकता है। लेकिन कपटरूपी खटाई पड़ते ही दूध फट जाता है और पानी अलग हो जाता है। तात्पर्य — सतीजी के कपट (सीता रूप) ने शिवजी के प्रेम-
यह सोरठा शिवजी और सतीजी के सम्बन्ध की दशा का वर्णन करती है। पूरी सोरठा — 'जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि।
बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि॥' इसका अर्थ — प्रीतिकी सुन्दर रीत देखिये कि जल भी (दूधके साथ मिलकर) दूधके समान भाव बिकता है।
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