विस्तृत उत्तर
यह सोरठा शिवजी और सतीजी के सम्बन्ध की दशा का वर्णन करती है।
पूरी सोरठा — 'जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि। बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि॥'
इसका अर्थ — प्रीतिकी सुन्दर रीत देखिये कि जल भी (दूधके साथ मिलकर) दूधके समान भाव बिकता है। परन्तु फिर कपटरूपी खटाई पड़ते ही पानी अलग हो जाता है (दूध फट जाता है) और स्वाद (प्रेम) जाता रहता है।
तात्पर्य — जब तक प्रेम में कपट (छल) नहीं आता, तब तक जल भी दूध के समान मूल्यवान बना रहता है। लेकिन जैसे ही कपट (खटाई) आता है, दूध फट जाता है और पानी अलग हो जाता है। वैसे ही सतीजी के कपट (सीता रूप धारण) ने शिवजी के प्रेम-सम्बन्ध को तोड़ दिया।