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रामचरितमानस — बालकाण्ड⏱ 1 मिनट पठन

'जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि'

अर्थ — प्रेम की सुन्दर रीति देखो कि जल भी दूध के साथ मिलकर दूध के भाव बिकता है।

संक्षिप्त उत्तर

अर्थ — प्रेम की सुन्दर रीति देखो कि जल भी दूध के साथ मिलकर दूध के भाव बिकता है। लेकिन कपटरूपी खटाई पड़ते ही दूध फट जाता है और पानी अलग हो जाता है। तात्पर्य — सतीजी के कपट (सीता रूप) ने शिवजी के प्रेम-बन्धन को तोड़ दिया।

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विस्तृत उत्तर

यह सोरठा शिवजी और सतीजी के सम्बन्ध की दशा का वर्णन करती है।

पूरी सोरठा — 'जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि। बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि॥'

इसका अर्थ — प्रीतिकी सुन्दर रीत देखिये कि जल भी (दूधके साथ मिलकर) दूधके समान भाव बिकता है। परन्तु फिर कपटरूपी खटाई पड़ते ही पानी अलग हो जाता है (दूध फट जाता है) और स्वाद (प्रेम) जाता रहता है।

तात्पर्य — जब तक प्रेम में कपट (छल) नहीं आता, तब तक जल भी दूध के समान मूल्यवान बना रहता है। लेकिन जैसे ही कपट (खटाई) आता है, दूध फट जाता है और पानी अलग हो जाता है। वैसे ही सतीजी के कपट (सीता रूप धारण) ने शिवजी के प्रेम-सम्बन्ध को तोड़ दिया।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

'जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि' — इस सोरठा का क्या अर्थ है को संदर्भ सहित समझें

'जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि' — इस सोरठा का क्या अर्थ है का सबसे सीधा सार यह है: अर्थ — प्रेम की सुन्दर रीति देखो कि जल भी दूध के साथ मिलकर दूध के भाव बिकता है। लेकिन कपटरूपी खटाई पड़ते ही दूध फट जाता है...

रामचरितमानस — बालकाण्ड जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.

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रामचरितमानस — बालकाण्ड प्रश्नोत्तर
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