जनेऊ धारण करते समय 'यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥' मंत्र पढ़ा जाता है, जिसका अर्थ है — यह परम पवित्र और आयुवर्धक यज्ञसूत
जनेऊ को संस्कृत में 'यज्ञोपवीत' कहते हैं। यह हिंदू धर्म के प्रमुख सोलह संस्कारों में से एक — उपनयन संस्कार — का मुख्य अंग है।
'उपनयन' का अर्थ है 'पास ले जाना' — अर्थात् बालक को ब्रह्मज्ञान की दिशा में ले जाना।