विस्तृत उत्तर
जनेऊ को संस्कृत में 'यज्ञोपवीत' कहते हैं। यह हिंदू धर्म के प्रमुख सोलह संस्कारों में से एक — उपनयन संस्कार — का मुख्य अंग है। 'उपनयन' का अर्थ है 'पास ले जाना' — अर्थात् बालक को ब्रह्मज्ञान की दिशा में ले जाना। जनेऊ के तीन धागे ब्रह्मा-विष्णु-महेश और देवऋण, पितृऋण, ऋषिऋण के प्रतीक हैं।
जनेऊ धारण करते समय निम्न मंत्र पढ़ा जाता है:
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥
हिंदी अर्थ: यह यज्ञोपवीत (जनेऊ) परम पवित्र है, यह प्रजापति ब्रह्मा के साथ ही अनादि काल से विद्यमान है। आयु की वृद्धि करने वाला यह शुभ और उज्जवल सूत्र मैं धारण करता हूँ — इससे मुझे बल और तेज प्राप्त हो।
पुराना जनेऊ अपवित्र हो जाने पर उतारते समय यह कहा जाता है:
एतावद्दिन पर्यन्तं ब्रह्मत्वं धारितं मया।
जीर्णत्वात्त्वत्परित्यागो गच्छ सूत्र यथासुखम्॥
अर्थ: आज तक मैंने तुम्हें धारण किया, अब तुम जीर्ण हो गए हो — सुखपूर्वक जाओ।
श्रावण पूर्णिमा को रक्षाबन्धन-पर्व पर विधिपूर्वक नया जनेऊ धारण करने की परम्परा है, जिसे 'उपाकर्म' कहते हैं।





