विस्तृत उत्तर
यज्ञोपवीत (जनेऊ) में तीन मुख्य सूत्र होते हैं और प्रत्येक सूत्र में तीन-तीन धागे होते हैं — इस प्रकार कुल नौ धागे होते हैं। इन तीन सूत्रों के अनेक प्रतीकार्थ शास्त्रों में वर्णित हैं:
पहला अर्थ — त्रिमूर्ति प्रतीक: तीनों सूत्र ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक हैं। जनेऊ धारण करने वाला तीनों देवों की कृपा का पात्र बनता है।
दूसरा अर्थ — तीन ऋणों का प्रतीक: यह सबसे महत्वपूर्ण अर्थ है। प्रत्येक मनुष्य के जीवन में तीन ऋण माने गए हैं जिन्हें चुकाने का दायित्व जनेऊ धारण करके लिया जाता है। देवऋण — देवताओं का ऋण जो यज्ञ, पूजा और धार्मिक कर्तव्य से चुकाया जाता है। पितृऋण — माता-पिता और पूर्वजों का ऋण जो श्राद्ध, तर्पण और संतानोत्पत्ति से चुकाया जाता है। ऋषिऋण — ऋषि-मुनियों का ऋण जो उनके ज्ञान का अध्ययन और उसे आगे बढ़ाने से चुकाया जाता है।
तीसरा अर्थ — त्रिगुण प्रतीक: तीन सूत्र सत्व, रज और तम — तीन गुणों के प्रतीक हैं। जनेऊ धारण करने वाले को सत्व गुण की वृद्धि का संकल्प लेना होता है।
चौथा अर्थ — गायत्री मंत्र के तीन चरण: जनेऊ गायत्री मंत्र के तीन पादों का प्रतीक है — 'तत्सवितुर्वरेण्यं', 'भर्गो देवस्य धीमहि', 'धियो यो नः प्रचोदयात्।' जनेऊ धारण से गायत्री जप का अधिकार मिलता है।
जनेऊ की नौ तारों का भी विशेष अर्थ है — ये नौ तार शरीर के नौ द्वारों (एक मुख, दो नासिका, दो आँखें, दो कान, मल और मूत्र) के प्रतीक हैं — जो संकेत देते हैं कि इन सभी इंद्रियों को संयम में रखा जाए।

