विस्तृत उत्तर
जनेऊ को शौच और मूत्र-विसर्जन के समय दाहिने कान पर लपेटने का नियम शास्त्रों में स्पष्ट रूप से वर्णित है और इसके पीछे धार्मिक एवं वैज्ञानिक दोनों कारण हैं।
शास्त्रीय आधार — मनुस्मृति और विभिन्न धर्मग्रंथों में स्पष्ट कहा गया है — 'यथा-निवीनी दक्षिण कर्णे यज्ञोपवीतं कृत्वा मूत्रपुरीषे विसृजेत' — अर्थात मल-मूत्र विसर्जन के समय यज्ञोपवीत को दाहिने कान पर धारण करके करना चाहिए। इसका प्रमुख कारण यह है कि जनेऊ अत्यंत पवित्र वस्तु है और उसे अपवित्र स्थान में नीचे नहीं आने देना चाहिए। कान पर लपेटने से वह कमर से ऊपर रहता है और अशुद्ध नहीं होता।
धार्मिक भाव — दाहिना कान ब्रह्मनाड़ी (ब्रह्म की नाड़ी) का स्थान माना गया है। शास्त्रों में दाहिने कान पर गंगा, यमुना, गोदावरी आदि सभी पवित्र नदियों का वास माना गया है। इसलिए जनेऊ को दाहिने कान पर लपेटने से उसकी पवित्रता बनी रहती है।
वैज्ञानिक कारण — दाहिने कान पर स्थित एक्यूपंक्चर बिंदु (Acupressure point) का संबंध आंतों और पाचन-तंत्र से होता है। जब जनेऊ कान पर लपेटा जाता है तो उस बिंदु पर हल्का दबाव पड़ता है जो पेट की आँत और मलाशय को उचित कार्य करने में सहायता करता है। इससे कब्ज की समस्या नहीं होती और मल-विसर्जन सुचारु होता है। इसके अतिरिक्त यह सूर्यनाड़ी को भी जागृत करता है।





